

२००७ की आईपीसीसी की रिपोर्ट मै कहा गया था की यदि ग्लेसिअर पिग्लने की रफ़्तार यूँ ही चलती रही तो २०३५ tak हिमालय के सभी ग्लेसिअर पिगल जँाऐंगे।लेकिन हाल ही में आईपीसीसी ने स्वीकार किया है कि यह रिपोर्ट कमजोर तथ्यों पर आधारित थी। जिसे आईपीसीसी के chairmen राजेंदर पचोरी ने भी स्वीकार है
दरअसल यह घटना स्पष्ट करती है कि किस तरह से विकसित देश कमजोर तथ्यों पर या मनगढ़ंत रिपोर्टों की आड़ में विकासशील देशों का दमन करते आए हैं।
वर्ष 2002 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की ब्राउन क्लाउड यानी भूरा बादल संबंधी एक रिपोर्ट में भारत और चीन को जिम्मेदार ठहराया था कि दक्षिण एशिया का आकाश प्रदूषण के कारण एक भूरे रंग की धुंध से ढ़क गया है और 3 किलोमीटर मोटी इस प्रदूषित चादर के कारण धरती पर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश में 10 से 15 प्रतिशत तक की कमी आई है।कृषि,मानसून और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव प्रभाव पड़ा है।उस समय आईआईटी बैंगलूरू के दो पर्यावरण वैज्ञानिकों ने इन तर्कोें को ही निराधार बताया था।
इसी तरह एक अन्य शोध में बताया गया कि भारत ने 1990 में धान की खेती के कारण प्रतिवर्ष लगभग 38 मिलियन टन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली मीथेन गैंस का उत्सर्जन किया।जबकि कृषि वैज्ञानिक एपी मित्रा ने इसका प्रतिकार किया और बताया कि उत्सर्जन 38 नहीं 4 मिलियन टन प्रति वर्ष हुआ था।
यह उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि किस तरह से विकसित देश भविष्य में पर्यावरण के नाम पर अपने-अपने आथर््िाक हित साधेंगे और उनके यह हित आर्थिक प्रतिबंध,महंगी तकनीक,आयात पर टैक्स में बढ़ोतरी आदि के रूप में होंगे।ऐसे में भारत को ऐसा पर्यावरण तंत्र विकसित करना होगा।जिसमें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों पर सख्ती से कदम उठाना होगा।ताकि इस तरह से विकसित देशों की दादागिरी को रोका जा सके।
दरअसल यह घटना स्पष्ट करती है कि किस तरह से विकसित देश कमजोर तथ्यों पर या मनगढ़ंत रिपोर्टों की आड़ में विकासशील देशों का दमन करते आए हैं।
वर्ष 2002 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की ब्राउन क्लाउड यानी भूरा बादल संबंधी एक रिपोर्ट में भारत और चीन को जिम्मेदार ठहराया था कि दक्षिण एशिया का आकाश प्रदूषण के कारण एक भूरे रंग की धुंध से ढ़क गया है और 3 किलोमीटर मोटी इस प्रदूषित चादर के कारण धरती पर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश में 10 से 15 प्रतिशत तक की कमी आई है।कृषि,मानसून और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव प्रभाव पड़ा है।उस समय आईआईटी बैंगलूरू के दो पर्यावरण वैज्ञानिकों ने इन तर्कोें को ही निराधार बताया था।
इसी तरह एक अन्य शोध में बताया गया कि भारत ने 1990 में धान की खेती के कारण प्रतिवर्ष लगभग 38 मिलियन टन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली मीथेन गैंस का उत्सर्जन किया।जबकि कृषि वैज्ञानिक एपी मित्रा ने इसका प्रतिकार किया और बताया कि उत्सर्जन 38 नहीं 4 मिलियन टन प्रति वर्ष हुआ था।
यह उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि किस तरह से विकसित देश भविष्य में पर्यावरण के नाम पर अपने-अपने आथर््िाक हित साधेंगे और उनके यह हित आर्थिक प्रतिबंध,महंगी तकनीक,आयात पर टैक्स में बढ़ोतरी आदि के रूप में होंगे।ऐसे में भारत को ऐसा पर्यावरण तंत्र विकसित करना होगा।जिसमें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों पर सख्ती से कदम उठाना होगा।ताकि इस तरह से विकसित देशों की दादागिरी को रोका जा सके।
