Saturday, April 10, 2010

नक्सलवाद और गेट नंबर ३


अमोसी एअरपोर्ट के गेट नंबर ३ पर यूँ तो हर रोज सेकड़ों निगाहें अपनों के इंतजार में लगी रहती होंगी । मगर आज यानी ७ अप्रैल २०१० के दिन इस गेट नंबर ३ का नजारा कुछ और था । रोज की तरह यहाँ आज भी सेकड़ों निगाहें थीं, लेकिन ये किन्ही परिजनों की नहीं बल्कि सी आर पी एफ ,सी आई आर एफ और यू पी पुलिस के छोटे से लेकर बड़े अफसर तक की थी जो पहुंचा था यहाँ शहीदों को श्रदांजलि देने के लिए।

वह जवान जो शहीद हुए थे छतीसगढ़ में दंतेवाडा के नक्सली हमले में। चारों तरफ गहमागहमी थी और पुलिसिया प्रशासन जुटा था शहीदों को सम्मान देने की तयारी में। कहीं आला अधिकारी आदेश पर आदेश दे रहे थे, तो कहीं सी आर पी एफ जवान गार्ड ऑफ़ ओनर देने के लिए पंक्तियों में खड़े हो रहे

थे

बेहरहाल वक्त हुआ ३ बजकर १७ मिनट और गेट नंबर ३ अपनी भूमिका निभाने के लिए तेयार हो गया। सम्मान देने पहुंचे जवानों का एक जतथा गेट नंबर ३ से जेसे ही भीतर गया गेट नंबर ३ के बाहर सन्नाट छा गया ये जवान गए तो अकेले लेकिन लोटे एक शव के साथ । यह शव था एक जवान का और यह जवान था कांस्टेबल रामानंद यादव। शहीद रामानंद यादव का शव जेसे ही गेट नंबर ३ से बाहर निकला सबके दिल ठिठक कर रह गए । फिर शुरू हुआ एक के बाद एक शवों का आना और एक एक कर जेसे १२ शव गेट नंबर ३ से बाहर आते आम से लेकर खास तक की आँखों से आंसू छलक आये ।

गार्ड ऑफ़ ओनर में मोजूद एक रोटी हुई महिला से जब पूछा गया की क्या इन शहीदों में आपका भी कोई था तो उसका जवाब था की ये सब अपने ही तो थे और फफक फफक कर रो पड़ी। लेकिन १२ शहीदों को एक साथ श्रदांजलि देने वाला यह गेट नंबर ३ इतिहास बन गया।

Wednesday, April 7, 2010

लखनऊ में बहुत कुछ खास है


लखनऊ में बहुत कुछ खास है


यहाँ दिल्ली की तरह खीरे,मूली और गोभी


किलो में नहीं बल्कि २ रुपये ५ रुपये की मिलती।


यहाँ ज्यादातर शाही खाना चाँदी के वर्क और ताम्बे के बर्तन में परोसा जाता है इसके पीछे वजह ये है की पुराने समय में जो अवाद के नवाब थे वो अपने दुश्मन के षडयन्त्रो से बचने के लिए खान इस तरह से परोसने का आदेश देते थे क्यूंकि अगर खाने में जहर होता था तो वेरक तुरंत नीला हो जाता था इसी तरह ताम्बे का बर्तन किनारों से काला रंग छोड़ देता था


यहाँ की खास स्वीट डिश अनारदाने का पुलाव है

Tuesday, April 6, 2010

तहजीब के इस शहर से तहजीब ही गायब है


कहते है नवाबों के शहर लखनऊ

में एक चीज जो खास है वो है यहाँ कि तहजीब

जिसके लिए इसे देश और दुनिया में जाना जाता है

इस शहर में आये मुझे ४ दिन हो गए और इन 4 दिनों का मेरा

अनुभव मुझे यह कहने पर मजबूर करता है कि

तहजीब के इस शहर से तहजीब ही गायब है

औरत के लिए इस शहर में कोई सम्मान नहीं

बस है तो सिर्फ गन्दी घूरती निगाह्यें
बस चले तो यह औरत को नोच खाएं

ऐसा नही कि यह सब दिल्ली जेसे बड़े शहरो में नही होता

मगर वहां कुछ खास लोग है जो ऐसी सोच के है

वर्ना वहां औरत के ब्रेन विद ब्यूटी को सम्मान है

लेकिन यहाँ सड़क चाप लोगों से लेकर बड़े बड़े दफ्तरों तक बस यही हाल है

सर से लेकर पांव तक घूरती nighayein या फिर सड़क चाप फब्तियां

aurat के सम्मान के लिहाज से गतिया शहर है लखनऊ

आज मैं भूखी हूँ


मुझे करीब से जानने वाले लोग जानते है

कि मैं खाने की बहुत बड़ी शोकिन हूँ

मेरा मानना है कि इस दुनिया में do तरह के लोग रहते है

एक वो जो जीने के लिए खाते है

और एक वो जो खाने के लिए jite है

बेहरहाल अपनी गिनती दूसरे तरह के लोगों में होती है

मगर आज का दिन मुझे जीवन भर याद रहेगा

शाम के ६ बजने को आयें है आज मैं भूखी हूँ

ऐसा नही है कि मेरे पास पइसे नही मगर

ऑफिस से लेकर दूर दूर तक khin कैंटीन नहीं

लेकिन दिल्ली से अच्हा जलजीरा यहाँ जरुर मिलता है

आस है कि अच्हा खाना मिल जाये वर्ना bhagwaan जाने मेरा क्या होगा

अंत में तो यही सोच कर संतोष कर लूँ हारे को हरी नाम .