Wednesday, March 17, 2010

खुद पर से ही विश्वास क्यूँ उठने लगता है।

नर हो न निराश करो मन को
आज कल ये जुमला हमारी क्लास मै बड़ा
छाया हुआ है मगर फिर भी मै इसे क्यूँ लिख रही हूँ
इसके पीछे भी एक बात है मेरे ठीक साथ वाली कुर्सी पर मेरा एक दोस्त बेहद हताश है
और उस से भी बढ कर वो खुद एक लेख में ये लिख रहा है की उसे अब अपनी काबिलियत पर ही शक होने लगा है। आखिर खुद पर से ही विश्वास क्यूँ उठने लगता है।

2 comments:

  1. बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

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  2. dhanyavad sanjay ji mujhe padne or tarif ke liye
    umid hai ki silsila ab jari rahega me kiran kaur hun or mass com ki student hun.

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